भारत को 'मुक्त तिब्बत' का समर्थन करने और नेहरू युगीन गलती को सुधारने की आवश्यकता है।



१९५० के दशक में चीनी लोगों की आमद से पहले, तिब्बत एक आत्मनिर्भर समाज था। तिब्बत पर चीनी आक्रमण, जिसका समापन १९६२ में भारत और चीन के बीच युद्ध में हुआ था, को अक्सर "महान चीनी विश्वासघात" और "पीठ में छुरा" के रूप में चित्रित किया गया है। लेकिन वास्तव में यह एक "सामने से छूरा घोंपना" था, क्योंकि यह छुरा भारत के अपने प्रधान मंत्री, जवाहरलाल नेहरू द्वारा आमंत्रित किया गया था।

भारत के प्रथम प्रधान मंत्री, जवाहरलाल नेहरू ने वास्तव में तिब्बत को जीतने में चीन की मदद की। सरदार पटेल ने माना था कि १९५० में, चीन एक कमजोर स्थिति में था, पूरी तरह से कोरिया में प्रतिबद्ध था और किसी भी तरह से भूमि हथियाने में महसूस नहीं करता था । लेकिन नेहरू ने पटेल की उपेक्षा की।

लेकिन कश्मीर में शेख अब्दुल्ला से नजदीकियों के कारण जो गलतियां हुई, उसे फिर से दोहराया गया और इस बार अपने पूर्वी पड़ोसी के साथ । पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) ने १९५० में चमडो की लड़ाई में तिब्बती सेना को हराया था।

यदि भारत ने आक्रामक रुख अख्तियार किया होता, तो उसे अंतर्राष्ट्रीय समर्थन प्राप्त होता और विश्व जनमत तिब्बत में चीनी आक्रमण के सख्त खिलाफ होता। दुनिया वास्तव में भारत की ओर "नेतृत्व क्षमता" रखने वाला देश समझता था । नेहरू ने उस समय पटेल की और बाद में आंबेडकर की भी नहीं सूनी।

१९५६ से शुरू होकर, CIA ने भारतीय क्षेत्र का उपयोग भारत के कालिम्पोंग में बेस के साथ, चीनी सैनिकों से लड़ने के लिए तिब्बती गुरिल्लाओं की भर्ती के लिए किया। १९५८ में जब भारतीयों को पता चला कि चीन ने झिंजियांग और तिब्बत के बीच अक्साई चिन में भारतीय क्षेत्र से होकर सड़क बनाई है, जो ऐतिहासिक रूप से भारतीय राज्य लद्दाख का एक हिस्सा है, तो आम जनता आक्रोशित हो उठी ।

इन और कुछ अन्य संबंधित घटनाओं ने १९६२ में भारत-चीन में युद्ध शुरू हो गया ।

'मुक्त तिब्बत' की घोषणा करने का सुनहरा मौका

चीन को दुनिया को CoVID-19 वायरस के बारे में सूचित नहीं करने के लिए, अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर दुनिया के खिलाफ आक्रामक तरीके से जाने के लिए, चीन को सख्त ताकीद देनी चाहिए । चीन हांगकांग में नए 'राष्ट्रीय सुरक्षा कानून' से वहां के निवासियों को भयभीत कर रहा है । इस पर भी ध्यान दिया जाना है।

इस लेख को लिखते समय, चीनी सरकार के मुखपत्र, ग्लोबल टाइम्स, ने ३ जून २०२० को बताया कि तिब्बत में चीनी सेना ने भारत के साथ चल रहे सीमा गतिरोध के बीच तंगगुला पर्वत में उच्च ऊंचाई पर रात में घुसपैठ की कोशिशें कीं। "चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) तिब्बत मिलिट्री कमांड ने हाल ही में दुश्मन की रेखाओं के पीछे घुसपैठ अभ्यास के लिए ४७०० मीटर की ऊंचाई पर उच्च ऊंचाई वाले क्षेत्र में सेना भेजी थी और कठोर वातावरण के तहत उनकी लड़ाकू क्षमता का परीक्षण किया था"।

इससे पहले मई २०२० में रिपब्लिकन सांसद स्कॉट पेरी ने तिब्बत को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता देने के लिए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को अधिकृत करने के लिए कांग्रेस में एक विधेयक पेश किया था। उन्होंने हांगकांग के लिए भी इसी तरह का विधेयक पेश किया है और इन दोनों विधेयकों को विदेश मामलों की सदन समिति को भेजा गया था।

चीन के खिलाफ एक समग्र अंतर्राष्ट्रीय जनमत के साथ, भारत को नेहरू युगीन गलती को सुधारने के लिए एक पहल और 'मुक्त तिब्बत' का समर्थन करने की आवश्यकता है।


Thank you to ONETOUCH APPLABS for giving us the RCA - Remove China Apps

CHINA KO JAWAAB | Sena degi bullet se, Naagrik dengey wallet se | Sonam Wangchuk, Ladakh


स्वातंत्र्यवीर वीर सावरकर : भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के क्रांतिकारी नेता


विनायक दामोदर सावरकर का जन्म २८ मई १८८३ को नासिक के भगूर गांव में हुआ। स्वातंत्र्यवीर वीर सावरकर भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के अग्रिम पंक्ति के सेनानी और प्रखर राष्ट्रवादी नेता थे। सावरकर हमेशा से अखंड भारत के पक्षधर रहे ।

हिन्दू राष्ट्र की राजनीतिक विचारधारा को विकसित करने का बहुत बड़ा श्रेय सावरकर को जाता है। वे न केवल स्वाधीनता-संग्राम के एक तेजस्वी सेनानी थे अपितु महान क्रान्तिकारी, चिन्तक, लेखक, कवि, ओजस्वी वक्ता तथा दूरदर्शी राजनेता भी थे। १९०४ में उन्हॊंने अभिनव भारत नामक एक क्रान्तिकारी संगठन की स्थापना की। १९०५ में बंगाल के विभाजन के बाद उन्होने पुणे में विदेशी वस्त्रों की होली जलाई। फर्ग्युसन कॉलेज, पुणे में भी वे राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत ओजस्वी भाषण देते थे। उन्होंने १८५७ के प्रथम स्वातंत्र्य समर का सनसनीखेज व खोजपूर्ण इतिहास लिखकर ब्रिटिश शासन को हिला कर रख दिया था ।





वे रूसी क्रांतिकारियों से ज्यादा प्रभावित थे। लंदन में रहने के दौरान सावरकर की मुलाकात लाला हरदयाल से हुई। लंदन में वे इंडिया हाउस की देखरेख भी करते थे। मदनलाल धींगरा को फांसी दिए जाने के बाद उन्होंने 'लंदन टाइम्स' में भी एक लेख लिखा था। उन्होंने धींगरा के लिखित बयान के पर्चे भी बांटे थे।

वीर सावरकर १९११ से १९२१ तक अंडमान जेल में रहे। नासिक जिले के कलेक्टर जैकसन की हत्या के लिए नासिक षडयंत्र काण्ड के अन्तर्गत इन्हें ७ अप्रैल, १९११ को काला पानी की सजा पर सेलुलर जेल भेजा गया। यहां स्वतंत्रता सेनानियों को कड़ा परिश्रम करना पड़ता था। यहां कोल्हू में बैल की तरह जुत कर सरसों व नारियल आदि का तेल निकालना होता था। इसके अलावा उन्हें जेल के साथ लगे व बाहर के जंगलों को साफ कर दलदली भूमी व पहाड़ी क्षेत्र को समतल भी करना होता था। रुकने पर उनको कड़ी सजा व बेंत व कोड़ों से पिटाई भी की जाती थीं। इतने पर भी उन्हें भरपेट खाना भी नहीं दिया जाता था। १९२१ में वे स्वदेश लौटे और फिर ३ साल जेल भोगी। जेल में 'हिन्दुत्व' पर शोध ग्रंथ लिखा।

फरवरी, १९३१ में इनके प्रयासों से मुंबई में पतित पावन मन्दिर की स्थापना हुई, जो सभी हिन्दुओं के लिए समान रूप से खुला था। २५ फ़रवरी १९३१ को सावरकर ने मुंबई प्रेसीडेंसी में हुए अस्पृश्यता उन्मूलन सम्मेलन की अध्यक्षता की १९३७ में वे हिन्दू महासभा के अध्यक्ष चुने गए। १९४३ के बाद वे दादर, मुंबई में रहे।

भारत के इस महान क्रांतिकारी का २६ फ़रवरी १९६६ को निधन हुआ। उनका संपूर्ण जीवन स्वराज्य की प्राप्ति के लिए संघर्ष करते हुए ही बीता।

वीर शिरोमणी महाराणा प्रताप की जयन्ती के अवसर पर, पराक्रमी वीर योद्धा को कोटि कोटि नमन


हिन्द के गौरव, हिन्दुवा सूरज, अदम्य साहसी एवं स्वाभिमानी प्रातःस्मरणीय वीर शिरोमणी महाराणा प्रताप की जयन्ती अवसर पर, पराक्रमी वीर योद्धा को कोटि कोटि नमन करते हुऐ अपने लेखन के माध्यम से श्र्द्धा सुमन अर्पित करता हूँ।

भारतीय हिंदू पंचांग के अनुसार प्रताप का जन्म विक्रम संवत १५९७ ( ९ मई १५४० ई. ) की ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया को कुंभलगढ़ दुर्ग में हुआ था। प्रताप के दादा महान योद्धा राणा सांगा थे और दादी महारानी कर्मवती थी। उन्हें बचपन और युवावस्था में कीका नाम से भी पुकारा जाता था। ये नाम उन्हें भीलों से मिला था जिनकी संगत में उन्होंने शुरुआती दिन बिताए थे। भीलों की बोली में कीका का अर्थ होता है - 'बेटा'। महाराणा प्रताप के पास चेतक नाम का एक घोड़ा था जो उन्हें सबसे प्रिय था। प्रताप की वीरता की कहानियों में चेतक का अपना स्थान है। उसकी फुर्ती, रफ्तार और बहादुरी की कई लड़ाइयां जीतने में अहम भूमिका रही।

महाराणा प्रताप के शासनकाल में सबसे रोचक तथ्य यह है कि मुगल सम्राट अकबर बिना युद्ध के राणा प्रताप को अपने अधीन लाना चाहता था । इसलिए अकबर ने राणा प्रताप को समझाने के लिए चार राजदूत नियुक्त किए जिसमें सर्वप्रथम सितम्बर १५७२ ई. में जलाल खाँ राणा प्रताप के खेमे में गया, इसी क्रम में मानसिंह, भगवानदास तथा राजा टोडरमल भी राणा प्रताप को समझाने के लिए पहुँचे, लेकिन राणा प्रताप ने चारों को निराश किया, इस तरह राणा प्रताप ने मुगलों की अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया जिसके परिणामस्वरूप हल्दी घाटी का ऐतिहासिक युद्ध हुआ।

अकबर ने किया जिहाद का ऐलान और महाराणा ने लढा हल्दी घाटी का ऐतिहासिक युद्ध

हल्दीघाटी का युद्ध १८ जून १५७६ ईस्वी में मेवाड़ तथा मुगलों के बीच हुआ था। इस युद्ध में मेवाड़ की सेना का नेतृत्व महाराणा प्रताप ने किया था। भील सेना के सरदार राणा पूंजा भील थे । इस युद्ध में महाराणा प्रताप की तरफ से लड़ने वाले एकमात्र मुस्लिम सरदार थे- हकीम खाँ सूरी।

इस युद्ध में मुगल सेना का नेतृत्व मानसिंह तथा आसफ खाँ ने किया। इस युद्ध का आँखों देखा वर्णन अब्दुल कादिर बदायूनीं ने किया। इस युद्ध को आसफ खाँ ने जिहाद की संज्ञा दी। आधुनिक दिनों में भी, हमने देखा है कि जिहादियों का काफिरों के साथ कैसा व्यवहार होता है। यह वही छठवीं शताब्दी की पुरानी मानसिकता है जो आज भी संपूर्ण मानवता को खतरे में डाल रही है।

हल्दीघाटी के युद्ध में उनका मानसिंह के नेतृत्व वाली अकबर की विशाल सेना से आमना-सामना हुआ। १५७६ में हुए इस जबरदस्त युद्ध में करीब २० हजार सैनिकों के साथ महाराणा प्रताप ने ८० हजार मुगल सैनिकों का सामना किया। यह मध्यकालीन भारतीय इतिहास का सबसे चर्चित युद्ध है। इस युद्ध में प्रताप का घोड़ा चेतक जख्मी हो गया था। इस युद्ध के बाद मेवाड़, चित्तौड़, गोगुंडा, कुंभलगढ़ और उदयपुर पर मुगलों का कब्जा हो गया था। अधिकांश राजपूत राजा मुगलों के अधीन हो गए लेकिन महाराणा प्रताप ने कभी भी स्वाभिमान को नहीं छोड़ा। उन्होंने मुगल सम्राट अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की और कई सालों तक संघर्ष किया।





दिवेर का गुरिल्ला युद्ध

अकबर ने १५७६ में महाराणा प्रताप से युद्ध करने का फैसला किया। इस युद्ध में मुगल सेना की अगुवाई करने वाला अकबर का चाचा सुल्तान खां था। विजयादशमी का दिन था और महाराणा ने अपनी नई संगठित सेना को दो हिस्सों में विभाजित करके युद्ध का बिगुल फूंक दिया। एक टुकड़ी की कमान स्वयं महाराणा के हाथ में थी, तो दूसरी टुकड़ी का नेतृत्व उनके पुत्र अमर सिंह कर रहे थे। मुगल सेना में २ लाख सैनिक थे, जबकि राजपूत केवल २२ हजार थे। महाराणा प्रताप की सेना ने महाराज कुमार अमर सिंह के नेतृत्व में दिवेर के शाही थाने पर हमला किया। यह युद्ध इतना भीषण था कि प्रताप के पुत्र अमर सिंह ने मुगल सेनापति पर भाले का ऐसा वार किया कि भाला उसके शरीर और घोड़े को चीरता हुआ जमीन में जा धंसा और सेनापति मूर्ति की तरह एक जगह गड़ गया।

उधर महाराणा प्रताप ने बहलोल खान के सिर पर इतनी ताकत से वार किया कि उसे घोड़े समेत २ टुकड़ों में काट दिया। स्थानीय इतिहासकार बताते हैं कि इस युद्ध के बाद यह कहावत बनी कि "मेवाड़ के योद्धा सवार को एक ही वार में घोड़े समेत काट दिया करते हैं"।



इस युद्ध में महाराणा ने गुरिल्ला युद्ध की युक्ति अपनाई। १५८२ में दिवेर के युद्ध में महाराणा प्रताप की सेना ने मुगलों को बुरी तरह पराजित करते हुए चित्तौड़ छोड़कर मेवाड़ की अधिकतर जमीन पर दोबारा कब्जा कर लिया।

महाराणा प्रताप पहले ऐसे भारतीय राजा थे, जिन्होंने बहुत नियोजित तरीके से गुरिल्ला युक्ति का उपयोग किया और परिणामस्वरूप मुगलों को घुटने टेकने पर मजबूर भी कर दिया। अकबर के सामने महाराणा पूरे आत्मविश्वास से टिके रहे। एक ऐसा भी समय था, जब लगभग पूरा राजस्थान मुगल बादशाह अकबर के कब्जे में था, लेकिन महाराणा अपना मेवाड़ बचाने के लिए अकबर से १२ साल तक लड़ते रहे। अकबर ने उन्हें हराने का हर हथकंडा अपनाया, लेकिन महाराणा आखिर तक अविजित ही रहे।

इतिहास में १५८२ का दिवेर युद्ध एक महत्वपूर्ण युद्ध माना जाता है, क्योंकि इस युद्ध में राणा प्रताप के खोये हुए राज्यों की पुनः प्राप्ती हुई, इसके पश्चात राणा प्रताप व मुगलो के बीच एक लम्बा संघर्ष युद्ध के रुप में घटित हुआ, जिसके कारण ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के एक अधिकारी तथा भारतविद कर्नल जेम्स टॉड ने इस युद्ध को "मेवाड़ का मैराथन" कहा | कर्नल टॉड ने महाराणा और उनकी सेना के शौर्य, युद्ध कुशलता को स्पार्टा के योद्धाओं सा वीर बताते हुए लिखा है कि वे युद्धभूमि में अपने से ४ गुना बड़ी सेना से भी नहीं डरते थे।

महाराणा प्रताप सिंह के डर से अकबर अपनी राजधानी लाहौर लेकर चला गया और महाराणा के स्वर्ग सिधारने के बाद आगरा ले आया।

एक सच्चे राजपूत, शूरवीर, देशभक्त, योद्धा, मातृभूमि के रखवाले के रूप में महाराणा प्रताप दुनिया में सदैव के लिए अमर हो गए।

चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण, ता ऊपर सुल्तान है मत चुके चौहान।



हिन्दुओ के सम्राट पृथ्वीराज चौहान (सन् ११६६ - ११९२ ) हिंदू क्षत्रिय राजा थे जो उत्तरी भारत में १२ वीं सदी के उत्तरार्ध के दौरान अजमेर और दिल्ली पर राज्य करते थे। पृथ्वीराज चौहान का जन्म अजमेर राज्य के वीर राजपूत महाराजा सोमश्वर के यहाँ हुआ था।



तराइन का प्रथम युद्ध - मोहम्मद गौरी पराजय

१२ वीं शताब्दी में, जब मोहम्मद गोरी को सोलंकियों ने हराया था और थार के पश्चिमी किनारे से पीछे हटना पड़ा, तो उसने भारत पर दूसरे मार्ग से आक्रमण करने की कोशिश की। लेकिन थार के दूसरी तरफ शक-अम्बरा के राजा पृथ्वीराज चौहान का क्षेत्र था और पृथ्वीराज चौहान अपनी बहादुरी और शिष्टता के लिए जाने जाते थे।

थानेश्वर से १४ मील दूर और सरहिंद के किले के पास तराइन नामक स्थान पर यह मोहम्मद गौरी से युद्ध लड़ा गया। तराइन के इस पहले युद्ध में राजपूतो ने गौरी की सेना के छक्के छुड़ा दिए। गौरी के सैनिक प्राण बचा कर भागने लगे। जो भाग गया उसके प्राण बच गए, किन्तु जो सामने आया उसे गाजर- मुली की तरह कट डाला गया। इस तरह चौहान ने गोरी को १७ बार खदेड़ा ,राजपुता की प्रथा है की वो निहत्थे दुश्मन पर हमला नहीं करते थे । इसी का फयदा उठाकर गोरी बार बार बचता गया और सम्राट चौहान के पेरो में गिर कर माफ़ी मांग लेता ।

Read in English - PrithiviRaj Chauhan



Read in English - Rajput Resistance to Muslim Aggression

पृथ्वीराज ने मोहम्मद गोरी को कैसे क्षमा किया, जिसे उसने ११९१ में हराया और बंदी भी बना लिया था

जब पकड़े गए मोहम्मद गोरी को पृथ्वीराज के सामने जंजीरों में बंधे कैद के रूप में लाया गया था, तो उसने पश्चाताप करने का नाटक किया, जबकि आंतरिक रूप से वह एक काफिर राजा द्वारा कब्जा किए जाने के लिए अपमानित होने पर क्रोध से भरा हुआ था। लेकिन अब पृथ्वीराज के सामने जंजीरों में कैदी के रूप में, मोहम्मद गोरी ने दया की भीख मांगी और वादा किया कि वह कभी भी भारत की ओर आंख नहीं उठाएगा। अपने दोस्त चंदबरदाई की सलाह के खिलाफ जाकर, उसने मोहम्मद को सम्मानपूर्वक रिहा करने का आदेश दिया ।

अगले वर्ष में, मोहम्मद ने पृथ्वीराज को अपना 'धोखा' देने वाला वादा तोड़ दिया और भारत पर एक बार फिर हमला किया। दोनों सेनाएं फिर से प्राचीन शहर थानेसर के पास तराइन के युद्ध के मैदान में एकत्र हुईं। लेकिन नियमों और विनियमन का उल्लंघन करते हुए, मुस्लिम सेना ने सुबह ३ बजे हमला किया । दोपहर तक, ऐसा लग रहा था कि तराइन की दूसरी लड़ाई भी उसी तरह जाएगी, जिस तरह से पहली बार गई थी। मोहम्मद ने अपने हाथों से एक बार फिर जीत को फिसलते हुए देखा।

पृथ्वीराज को अपमानित करने के लिए, मोहम्मद ने शब्द भेजा कि वह युद्ध को बंद कर देगा, अगर पृथ्वीराज ने आकर एकल मुकाबले में कुतुब-उद-दीन ऐबक का मुकाबला करेगा । अपने सैनिकों के जीवन को बचाने के लिए, और युद्ध को जल्दी से समाप्त करने के लिए पृथ्वीराज सहमत हो गए। एकल युद्ध में नियम यह था कि जब एक लड़ाके को या तो नीचे गिरा दिया जाता है या मार दिया जाता है, तो वह जिस सेना से होता है, वह हार मान लेता है। किसी अन्य लड़ाके को इस लड़ाई में भाग लेने की अनुमति नहीं है, इसलिए नाम - एकल मुकाबला।

कुतुब ने बेईमानी से कदम उठाते हुए पृथ्वीराज के घोड़े के पैरों में से एक को काट दिया। पृथ्वीराज अपने घायल घोड़े से गिर गए । मुस्लिम सैनिकों का एक जत्था, जो उस समय तक घोड़े की आड़ में खड़ा था, पृथ्वीराज पर कूद पड़ा. मुसलमान पृथ्वीराज को अपने साथ अफगानिस्तान ले गए।

इस भयंकर युद्ध के बाद चौहान तथा राज कवि चंदबरदाई को बंदी बना लिया गया।युद्धबंधी के रूप में उसे गौरी के सामने ले जाया गया। जहाँ उसने गौरी को घुर के देखा। गौरी ने उसे आँखें नीची करने के लिए कहा। पृथ्वीराज ने कहा की राजपूतो की आँखें केवल मृत्यु के समय नीची होती है। यह सुनते ही गौरी आगबबुला होते हुए उठा और उसने सेनिको को लोहे के गरम सरियों से उसकी आँखे फोड़ने का आदेश दिया। असल कहानी यहीं से शुरू होती है।

पृथ्वीराज को रोज अपमानित करने के लिए रोज दरबार में लाया जाता था। जहाँ गौरी और उसके साथी पृथ्वीराज का मजाक उड़ाते थे। उन दिनों पृथ्वीराज अपना समय अपने जीवनी लेखक और कवी चंद् बरदाई के साथ बिताता था। चंद् ने ‘पृथ्वीराज रासो’ नाम से उसकी जीवनी कविता में पिरोई थी। उन दोनों को यह अवसर जल्द ही प्राप्त हो गया जब गौरी ने तीरंदाजी का एक खेल अपने यहाँ आयोजित करवाया। पृथ्वीराज ने भी खेल में शामिल होने की इच्छा जाहिर की परन्तु गौरी ने कहा की वह कैसे बिना आँखों के निशाना साध सकता है। पृथ्वीराज ने कहा की यह उनका आदेश है। पर गौरी ने कहा एक राजा ही राजा को आदेश दे सकता है तब चाँद ने पृथ्वीराज के राजा होने का वर्तन्त कहा। गौरी सहमत हो गया और उसको दरबार में बुलाया गया। वहां गौरी ने पृथ्वीराज से उसके तीरंदाजी कौशल को प्रदर्शित करने के लिए कहा। चंद बरदाई ने पृथ्वीराज को कविता के माध्यम से प्रेरित किया। जो इस प्रकार है- “चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण, ता ऊपर सुल्तान है मत चुके चौहान।” पृथ्वीराज चौहान ने तीर को गोरी के सीने में उतार दिया और वो वही तड़प तड़प कर मर गया ।

धर्मवीर छत्रपति संभाजी महाराज - १४ मई १६४७

धर्मवीर छत्रपति संभाजी महाराज, या शंभू राजे, जैसा कि उन्हें कहा जाता था, महान छत्रपति शिवाजी महाराज के सबसे बड़े पुत्र थे। उनका जन्म १४ मई १६४७ को पुरंदर में हुआ था। संभाजी को धर्मवीर कहा जाता था क्योंकि उन्होंने औरंगज़ेब को कई सालों तक युद्ध में व्यस्त रखा और जब औरंगज़ेब ने उन्हें बंदी बना लिया तो उन्होंने इस्लाम कबूल करने से मना कर दिया। उन्हें चालीस दिनों से अधिक समय तक यातना दी गई, लेकिन दबाव के आगे धर्मवीर संभाजी नहीं झुके। आखरी तीन दिनों के दौरान औरंगज़ेब ने क्रूरता का कहर बरपा दिया । औरंगजेब ने संभाजी की जीभ को बाहर निकालने का आदेश दिया, उनकी आँखों को बाहर निकाला गया और उनके अंगों को काट दिया गया। तीसरे दिन, सिर को धड़ से अलग कर दिया । संभाजी एक सच्चे हिन्दू शहीद थे, जिन्होंने उपेक्षित जीवन और अधीनता के बजाय मौत को गले लगा लिया । आधुनिक दिनों में भी, हमने देखा है कि जिहादियों का काफिरों के साथ कैसा व्यवहार होता है। यह वही छठवीं शताब्दी की पुरानी मानसिकता है जो आज भी संपूर्ण मानवता को खतरे में डाल रही है।

आठवीं सदी के इस्लामी आक्रांताओं के सीने के दाह : राजा दाहिर सेन

भारतवर्ष की आठवीं सदी शूरवीर नायक के तौर पर जाना जाता था - राजा दाहिर सेन । राजा दाहिर सेन के शासन के ७४ वर्षों के दौरान नौ इस्लामी आक्रांताओं ने कम से कम १५ बार सिंध पर आक्रमण किया, लेकिन सिंध के इस शूरवीर ने १४ बार इन इस्लामी आक्रमणकारियों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया । बहुत कम लोग जानते हैं कि जब इस्लामी आक्रांताओं ने ६३४ में फारस पर आक्रमण किया था, तो उन्होंने ६३८ में एक बदमाश मुस्लिम खलीफा उमर के आदेश पर, सिंध में भारत पर आक्रमण किया, जो केवल चार वर्षों के अंतराल में हुआ था। लेकिन जब फारस ने सत्रह वर्षों में, ६५१ तक आत्मसमर्पण कर लिया था, तो इस्लामी आक्रांताओं को भारत में सात सौ साल लग गए और उसके बाद भी वे शांति से भारत पर शासन नहीं कर सके।

सिंध के प्रतापी राजा थे दाहिर सेन

आज सिंध मुस्लिम देश का एक हिस्सा है, जिसे पाकिस्तान कहा जाता है और जो १९४७ तक हिंदू भारत का हिस्सा था । सिंधु नदी के पूर्व में बसा सिंध। आज बेशक पाकिस्तान के हिस्से में है. लेकिन वैदिक काल में ये जगह हमारे भारत के ऋषि-मुनियों की तपोभूमि हुआ करती थी. मान्यता है कि वेदों की अलौकिक और कालातीत ऋचाओं की रचना सिंधु नदी के तट पर बसे सिंध के सुरम्य, मनोरम और पतितपावन वातावरण में हुई है. इसी सिंध क्षेत्र पर सातवीं शताब्दी के आखिरी दो दशक और आठवीं शताब्दी के शुरू के कुछ वर्षों तक एक परम प्रतापी, प्रजापालक और नीतिज्ञ राजा का शासन था - नाम था दाहिर सेन.



सिंध के तानेबाने में लगे दो तीर

दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है ये कि इतिहास के पन्नों में राजा दाहिर सेन को वो स्थान नहीं मिला जिसके वो अधिकारी थे. भारतवर्ष की सातवीं और आठवीं सदी साक्षी रही इस परम प्रतापी राजा की जिन्होंने ६७९ ईस्वी में जब सिंध की राजसत्ता संभाली तो उनके सामने चुनौतियों का अंबार था. अपनी मातृभूमि की आन बान और शान की खातिर उन्होंने इस्लामी आक्रांताओं से दुश्मनी मोल ली और युद्धभूमि में उनको घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया. ६३२ ईस्वी में साहसी राय की मृत्यु के बाद चच न सिर्फ राजा बना बल्कि उसकी विधवा सोहन्दी पर उसका दिल भी आ गया. दरबारियों से सलाह-मशविरे के बाद चच ने सोहन्दी से शादी कर ली.

राजा चच तंगदिल और अदूरदर्शी इंसान था. राजा बनते ही उसने सिंध के प्रमुख समुदायों लोहाणों, गुर्जरों और जाटों को अपमानित कर उन्हें उच्च पदों से हटा दिया. राजा चच के इस कदम से लोहाण, गुर्जर और जाट नाराज हो गए. सिंध के सामाजिक ताने-बाने के सीने में ये पहला तीर साबित हुआ. इन सब के बावजूद राजा चच ने सिंध पर तकरीबन ४० वर्षों तक शासन किया. इस दौरान मजबूत सैन्य शक्ति और युद्ध कौशल की वजह से उसने राज्य का विस्तार ही किया. ६७१ ईस्वी में चच की मृत्यु के बाद उसका भाई चंदर उत्तराधिकारी बना.

राजा चंदर ने भी अपने भाई चच की तरह एक बड़ी गलती की. राजा बनते ही उसने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया. इतना ही नहीं बौद्ध को अपना राज धर्म भी घोषित कर दिया. राजा चच ने लोहाणों, गुर्जरों और जाटों की नाराजगी मोल ली थी उसके भाई राजा चंदर ने बौद्ध को राजधर्म घोषित कर हिन्दुओं को कुपित कर दिया. सिंध के सामाजिक ताने-बाने के सीने में चंदर का ये कदम दूसरा तीर साबित हुआ.

राजा चंदर ज्यादा समय तक शासन नहीं कर सका. ६७९ ईस्वी में उसकी मृत्यु के बाद चच के पुत्र दाहिर सेन ने सिंध की गद्दी संभाली. अपने शासनकाल में दाहिर ने सिंध की गौरवमयी धरती को पुरानी गरिमा से जोड़ते हुए खुशियों से भर दिया. राजा बनते के बाद दाहिर सेन ने सिंध के सीने से उन तीरों को निकालने की कोशिश की. जो किसी और ने नहीं बल्कि उनके पिता और चाचा ने ही चलाए थे. लेकिन दाहिर सेन को तो असली चुनौती मिली अरब के इस्लामी आक्रमणकारियों से. क्योंकि सिंधु का वैभव और ऐश्वर्य उनसे देखा नहीं जा रहा था

हिन्दू धर्म की पुनर्स्थापना की राजा दाहिर ने -- भाग २

Jihadi State Pakistan needs a BIGGEST HIT
URI with a retaliation of SURGICAL STRIKE
PULWAMA with a retaliation of AIR STRIKE
HANDWARA should be with a retaliation of MUCH MUCH BIGGER STRIKE

Watch a PRECISE ATTACK before BIGGER STRIKE


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